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संघ की आत्मीय प्रार्थना.प्रार्थना का हिंदी अर्थ व ऐतिहासिक विकास क्रम

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                  ।।⛳ॐ श्री गुरुदेवाय नमः⛳।।  संघ की आत्मीय प्रार्थना है नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे.. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम में “प्रार्थना” का बहुत ही महत्व है.राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की हर गतिविधि दैनिक शाखा के जरिये संपन्न होती है.संघ की शाखा या अन्य कार्यक्रमों में इस प्रार्थना को अनिवार्यतः परमपवित्र “भगवा-ध्वज” को नमन करके गाया जाता है.शाखा का समापन “ध्वज प्रणाम” के साथ इसी प्रार्थना के माध्यम से होता है. प्रस्तुत है संघ की आत्मीय प्रार्थना…                                     ●”प्रार्थना”● नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोहम् | महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते ||१|| प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता इमे सादरं त्वां नमामो वयम् | त्वदीयाय कार्याय बध्दा कटीयं शुभामाशिषं देहि तत्पूर्तये || अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिं सुशीलं जगद्येन नम्रं भवेत् | श्रुतं चैव यत्कण्टकाकीर्ण मार्गं स्...

चालाक बूढ़े बैल और सियार ने मिलकर शेर को बनाया मुर्ख

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                  ।।🇮🇳ॐ श्री गुरुदेवाय नमः🇮🇳।।  एक बैल था। जब वह बूढ़ा हो गया तो उसका मालिक उसे जंगल में छोड़ आया। बैल बूढ़ा ज़रूर था लेकिन था बहुत समझदार। वह अपने गुणों, कमजोरियों और पसंद- नापसंद को अच्छी तरह जानता और समझता था। अपने मालिक के जाने के बाद जंगल में उसके सामने चुनौती भरी परिस्थितियों उत्पन्न हो गई । वह अपने रहने खाने और सुरक्षा का बंदोबस्त देखने लगा । जल्दी ही उसे एक खाली गुफ़ा मिल गई। गुफ़ा के पास ही एक तालाब था । वहाँ ढे़र सारी घास तथा जंगली पौधे भी थे। बैल को वह स्थान अपने लिए उपयुक्त लगा क्योंकि वहां रहने के साथ-साथ भोजन पानी एवं सुरक्षा की भी पूरी व्यवस्था थी। बैल ने सभी परिस्थितियों का आकलन किया और सुख शांति के साथ आराम से वहां अपनी जिंदगी बिताने का निश्चय किया । जंगल में रहते रहते बैल की दोस्ती अन्य जानवरों से भी हो गई । सियार से उसकी घनिष्ठता ज्यादा थी। बैल शान से अकेले रहता था । उसका साहस देख सियार उसे समय-समय पर खतरों से सचेत करता रहता था। दोनों को एक दूसरे पर भरोसा हो गया। सारा दिन खाते-पीते और सुस्ताते रहने के का...

मूर्ख वृक्ष की मूर्खता पुरे जंगल के सफाए का कारण बना

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                ।।🚩ॐ श्री गुरुदेवाय नमः🚩।।  एक जंगल में दो वृक्ष मिल जुलकर रहते थे। उसी जंगल में एक शेर और बाघ भी मित्रवत रहते थे। दोनों शिकार करते और अपनी भूख मिटाकर बचे हुए मांस और हड्डियां वहीं छोड़ देते थे, जिससे सारे वातावरण में दुर्गंध फैल जाती थी। एक दिन पहला वृक्ष बोला, "दोस्त ! ये जानवर मुसीबत बन गए हैं। इनकी जूठन की दुर्गंध से मेरा सांस लेना दूभर हो गया है।" दूसरे वृक्ष ने कहा, "हां, अब तो यहां रहना भी मुश्किल होता जा रहा है।"पहले वृक्ष ने गुस्से में कहा, "अब और बर्दाश्त नहीं कर सकता। इन जानवरों को यहां से भगाकर ही रहूंगा।" दूसरे वृक्ष ने समझाया, "नहीं मित्र! ऐसी बेवकूफी कभी न करना। ये जंगली पशु ही हमारी रक्षा करते हैं।" पहले वृक्ष ने दृढ़ स्वर में कहा, "किंतु यह तो सोचो, इनके यहां न रहने पर हवा कितनी शुद्ध व सुहावनी होगी। मैंने तो तय कर लिया है कि इन्हें यहां से भगाकर ही रहूंगा।' दूसरे वृक्ष ने फिर समझाया, "मित्र! तुम नहीं जानते कि क्या करने जा रहे हो?' इस प्रकार, दोनो काफी देर तक तर्क-वितर्क करते रहे। एक रात की बात...

सारस पक्षी की शिक्षा – A Moral Story In hindi

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                   ।।🚩ॐ श्री गुरुदेवाय नमः🚩।। प्राचीन समय की बात है एक गाँव में भोलु नाम का एक आलसी किसान रहता था | भोलु ने अपने खेतों में गेहूँ की फसल बो रखी थी|उन्ही में से किसी एक खेत में सारस पक्षी का एक जोड़ा भी रहता था। वहीं उनके अंडे थे। अंडे बढे़ और समय पर उनसे बच्चे निकले। लेकिन बच्चों के बड़े होकर उड़ने योग्य होने से पहले ही खेत की फसल पक गई। सारस बड़ी चिंता में पड़े। किसान खेत काटने आए, इससे पहले ही बच्चों के साथ उसे वहाँ से चले जाना चाहिए पर बच्चे उड़ सकते नहीं थे। सारस ने बच्चों से कहा- “हमारे न रहने पर यदि कोई खेत के पास आए तो उसकी बात सुनकर याद रखना। एक दिन जब सारस चारा लेकर शाम को बच्चों के पास लौटा तो बच्चों ने कहा- “आज किसान आया था। वह खेत के चारों ओर घूमता रहा। एक-दो स्थानों पर खड़े होकर देर तक खेत को घूरता था। वह कह रहा था कि खेत अब काटने योग्य हो गया। आज चलकर गाँव के लोगों से कहूँगा कि वे मेरा खेत कटवा दें।” सारस ने कहा- “तुम लोग डरो मत। खेत अभी नहीं कटेगा। अभी खेत कटने में देर है।” । कई दिन बाद जब एक दिन सारस शाम क...

भलाई की बुराई पर जीत की कालजयी कहानी- “हार की जीत” ( बाबा भारती और डाकू खड़गसिंह ). रचनाकार- श्री सुदर्शन जी.

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              ।।🚩ॐ श्री गुरुदेवाय नमः🚩।।   बाबा भारती और डाकू खड़गसिंह। कहानी- “हार की जीत” हमलोंगों नें बचपन से लेकर आजतक अपनी कक्षा की पुस्तकों मे एक से एक कहानियां पढ़ी है. उन्हीं में से एक कहानी है-“हार की जीत” ( बाबा भारती और डाकू खड़गसिंह ) हम में से बहुतों ने ये कहानी पढ़ी भी होगी. आइए एक बार फिर इस मार्मिक एवं अर्थपूर्ण कहानी को स्मरण करें और इसके भाव में डूब जाएं. तो प्रस्तुत है वो कहानी जो आज भी उतनी ही सशक्त एवं सार्थक है जितना पहले थी. यह कहानी न जाने कितने लोगों के मन,जीवन को आंदोलित कर उनके जीवन को बदल डाला है. प्राचीन समय की बात है – माँ को अपने बेटे और किसान को अपने लहलहाते खेत देखकर जो आनंद आता है, वही आनंद बाबा भारती को अपना घोड़ा देखकर आता था। भगवद्भजन से जो समय बचता,वह घोड़े को अर्पण हो जाता। वह घोडा बड़ा सुंदर था, बड़ा बलवान ।।उसके जोड़ का घोड़ा सारे इलाके में न था। बाबा भारती उसे ‘सुलतान’कहकर पुकारते , अपने हाथ से खरहरा करते, खुद दाना खिलाते और देख-देखकर प्रसन्न होते थे। उन्होंने रुपया,माल, असबाब, जमीन आदि अपना सब-कुछ छोड़...

सती अनसूया के सतीत्व बल का चमत्कार ! त्रिदेव बने दूधमुँहे बच्चे.

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                    ।।🚩ॐ श्री गुरुदेवाय नमः🚩।।  ब्रम्हर्षि कर्दम और देवी देवहूति की पुत्री अनसूया भारतवर्ष की अद्वितीय सती साध्वी नारी थी. उनके चरित्र में स्वाभाविक सत्य, धर्म, शील, सदाचार, विनय, लज्जा, क्षमा, सहिष्णता तपस्या आदि सद्गुण विकसित थे. ब्रह्माजी के मानस पुत्र परम तपस्वी महर्षि “अत्रि” को इन्होंने पतिरूप में प्राप्त किया था. पतिव्रता तो वो थी ही. पावन प्रेमभरी सतत सेवा से पति का हृदय जीत लिया था. तपस्या में खूब आगे बढ़ चुकी थीं फिर भी पति की सेवा को ही नारी के लिए परम कल्याण का साधन मानती थीं.  एक बार भगवती लक्ष्मीजी, माता सती और ब्रह्माणीजी को अपने पातिव्रत्य का बड़ा अभिमान आ गया. भगवान और सब सह लेते हैं किन्तु अपने भक्तों का अहंकार हरगिज नहीं सहते. भगवान परम करुणामय हैं पर अहंकार जीव को भगवान से दूरातिदूर ले जाता है. अहंकार ही तो जीव और शिव के बीच दीवार बनकर खड़ा है.  कौतुकप्रिय नारदजी को इन तीनों जगवन्दनीया देवियों के गर्व को दूर करने के निमित्त मन में प्रेरणा मिल गई. प्रथम वे पहुँचे लक्ष्मीजी के पास। उनको ...

जानिये! भोजन करने से पूर्व "भोजन मंत्र" का उच्चारण करने से होनेवाले लाभ के बारे में !

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                  । ।⛳ॐ श्री गुरुदेवाय नमः⛳।।  भारतीय संस्कृति में भोजन को भी सम्मान देने की परंपरा है। इसलिए शास्त्रों के अनुसार भोजन ग्रहण करने से पूर्व हमें "भोजन मंत्र" का उच्चारण जरूर करना चाहिए । आध्यात्मिक द्रष्टि से भोजन ग्रहण करने से पूर्व बोले गये मंत्र का बड़ा महत्व है | "भोजन मंत्र" द्वारा हम अन्न देवता का आव्हान करते है व उनके द्वारा हमें दिए गये उस भोजन का धन्यवाद् भी करते है और ऐसी कामना करते है कि इस संसार में कोई भी भूखा न रहे | यदि आप भी चाहते है कि आपके द्वारा ग्रहण किये गये भोजन से आपको सभी रसों की प्राप्ति हो व आपके द्वारा ग्रहण किया गया भोजन आपके शरीर को लगे तो आज से भोजन करने से पूर्व नीचे दिए मंत्र का उच्चारण करना शुरू कर दे | तो आइये जानते है भोजन ग्रहण करने से पूर्व बोले जाने वाले मंत्र को - भोजन पूर्व उच्चारणीय मंत्र "भोजन मंत्र" ॐ ब्रह्मार्पणम् ब्रह्महविर् ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् । ब्राँव तेन गन्तव्यम् ब्रह्मकर्म समाधिना ।।     (गीता)  यज्ञ में आहुति देने का साधन (सुचि, सुवा, हाथ की मृगि, हंस...

"आर्षवाणी" संघ के बैठकों के प्रारम्भ में बोले जाने वाला मंत्र अर्थात् "वैदिक संगठन मंत्र"

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।।⛳ॐ श्री गुरुदेवाय नमः⛳।।                                          आर्षवाणी संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। देवा भागं यथा पूर्वे सजानाना उपासते ।। पग से पग (कदम से कदम) मिलाकर चलो, स्वर में स्वर मिलाकर बोलो, तुम्हारे मनों में समान बोध हो। पूर्वकाल में जैसे देवों ने अपना भाग प्राप्त किया, सम्मिलित बुद्धि से कार्य करने वाले उसी प्रकार अपना-अपना अभीष्ट प्राप्त करते हैं। ॐ May we march forward with a common goal. May we be open-minded and work together in harmony.May we share our thoughts for integrated wisdom. May we follow the example of our ancestors who achieved higher goals by virtue of being united. समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सहचित्तमेषाम्। समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि।। इन (मिलकर कार्य करने वालों) का मन्त्र समान होता है अर्थात् ये परस्पर मन्त्रणा करके एक निर्णय पर पहुंचते हैं, चित्त सहित इनका मन समान होता है। मैं तु...