भलाई की बुराई पर जीत की कालजयी कहानी- “हार की जीत” ( बाबा भारती और डाकू खड़गसिंह ). रचनाकार- श्री सुदर्शन जी.
।।🚩ॐ श्री गुरुदेवाय नमः🚩।।
बाबा भारती और डाकू खड़गसिंह। कहानी- “हार की जीत”
हमलोंगों नें बचपन से लेकर आजतक अपनी कक्षा की पुस्तकों मे एक से एक कहानियां पढ़ी है. उन्हीं में से एक कहानी है-“हार की जीत” ( बाबा भारती और डाकू खड़गसिंह ) हम में से बहुतों ने ये कहानी पढ़ी भी होगी. आइए एक बार फिर इस मार्मिक एवं अर्थपूर्ण कहानी को स्मरण करें और इसके भाव में डूब जाएं. तो प्रस्तुत है वो कहानी जो आज भी उतनी ही सशक्त एवं सार्थक है जितना पहले थी. यह कहानी न जाने कितने लोगों के मन,जीवन को आंदोलित कर उनके जीवन को बदल डाला है.
प्राचीन समय की बात है –
माँ को अपने बेटे और किसान को अपने लहलहाते खेत देखकर जो आनंद आता है, वही आनंद बाबा भारती को अपना घोड़ा देखकर आता था। भगवद्भजन से जो समय बचता,वह घोड़े को अर्पण हो जाता। वह घोडा बड़ा सुंदर था, बड़ा बलवान ।।उसके जोड़ का घोड़ा सारे इलाके में न था। बाबा भारती उसे ‘सुलतान’कहकर पुकारते , अपने हाथ से खरहरा करते, खुद दाना खिलाते और देख-देखकर प्रसन्न होते थे। उन्होंने रुपया,माल, असबाब, जमीन आदि अपना सब-कुछ छोड़ दिया था, यहाँ तक कि उन्हें नगर के जीवन से भी घृणा थी। अब गाँव के बाहर एक छोटे से मंदिर में रहते और भगवान का भजन करते थे। ‘मैं सुलतान के बिना नहीं रह सकेंगा, उन्हें ऐसी भ्रांति-सी हो गई थी। वह उसकी चाल पर लट्टू थे। कहते, “ऐसा चलता है जैसे मोर घटा को देखकर नाच रहा हो।” जब तक संध्या समय सुलतान पर चढ़कर आठ-दस मील का चक्कर न लगा लेते, उन्हें चैन न आता।
खड्गसिंह उस इलाके का कुख्यात डाकू था। लोग उसका नाम सुनकर काँपते थे। होते-होते सुलतान की कीर्ति उसके कानों तक भी। पहुँची। उसका हृदय उसे देखने के लिए अधीर हो उठा। वह एक दिन दोपहर के समय बाबा भारती के पास पहुँचा और नमस्कार करके बैठ गया।
बाबा भारती ने पूछा – “खड्गसिंह, क्या हाल है?”
खड्गसिंह ने सिर झुकाकर उत्तर दिया – “आपकी दया है।
“कहो, इधर कैसे आ गए?
सुलतान की चाह खींच लाई ।”
“विचित्र जानवर है। देखोगे तो प्रसन्न हो जाओगे ।”
“मैंने भी बड़ी प्रशंसा सुनी है।”
“उसकी चाल तुम्हारा मन मोह लेगी।”
“कहते हैं, देखने में भी बड़ा सुंदर है।”
“क्या कहना! जो उसे एक बार देख लेता है, उसके हृदय पर उसकी छवि अंकित हो जाती है।”
“बहुत दिनों से अभिलाषा थी, आज उपस्थित हो सका हूँ।”
बाबा भारती और खड्गसिंह अस्तबल में पहुँचे । बाबा ने घोड़ा दिखाया। घमंड से, खड्गसिंह ने घोड़ा देखा आश्चर्य से। उसने सहस्रों घोड़े देखे थे,
परंतु ऐसा बाँका घोड़ा उसकी आँखों से कभी न गुजरा था। सोचने लगा,भाग्य की बात है। ऐसा घोड़ा खड्गसिंह के पास होना चाहिए था। इस
साधु को ऐसी चीजों से क्या लाभ। कुछ देर तक आश्चर्य से चुपचाप खड़ा रहा। इसके पश्चात् उसके हृदय में हलचल होने लगी।
बालकों की-सी अधीरता से बोला – “परंतु बाबा जी, इसकी चाल न देखी तो क्या!”
बाबा जी भी मनुष्य ही थे। अपनी वस्तु की प्रशंसा दूसरे के मुख से सुनने के लिए उनका हृदय अधीर हो गया। घोड़े को खोलकर बाहर लेगए। घोड़ा वायु वेग से उड़ने लगा। उसकी चाल देखकर खड्गसिंह के हृदय पर साँप लोट गया। वह डाकू था और जो वस्तु उसे पसंद आ जाए उस पर वह अपना अधिकार समझता था। उसके पास बाहुबल था आदमी थे। जाते-जाते उसने कहा – “बाबाजी, मैं यह घोड़ा आपके पास न रहने दूंगा।”
बाबा भारती डर गए। अब उन्हें रात को नींद न आती। सारी रात अस्तबल की रखवाली में कटने लगी। प्रतिक्षण खड्गसिंह का भय लगा रहता, परंतु कई मास बीत गए और वह न आया। यहाँ तक कि बाबा भारती कुछ असावधान हो गए और इस भय को स्वप्न के भय की नाईं मिथ्या समझने लगे।
संध्या का समय था। बाबा भारती सुलतान की पीठ पर सवार होकर घुमने जा रहे थे। इस समय उनकी आँखों में चमक थी, मुख पर प्रसन्नता।
कभी घोड़े के शरीर को देखते, कभी उसके रंग को और मन में फूले न समाते थे।
सहसा एक ओर से आवाज आई – “ओ बाबा, इस कॅगले की सुनते जाना।” आवाज में करुणा थी। बाबा ने घोड़े को रोक लिया। देखा, एक अपाहिज वृक्ष की छाया में पड़ा कराह रहा है। बोले – “क्यों, तुम्हें क्या कष्ट है?”
अपाहिज ने हाथ जोड़कर कहा – “बाबा, मैं दुखिया हूँ। मुझ पर दया करो। रामावाला यहाँ से तीन मील है, मुझे वहाँ जाना है। घोड़े पर चढ़ा
लो, परमात्मा भला करेगा।”
“वहाँ तुम्हारा कौन है?”
“दुर्गादत्त वैद्य का नाम सुना होगा। उनका सौतेला भाई हूँ।
बाबा भारती ने घोड़े से उतरकर अपाहिज को घोड़े पर सवार किया और स्वयं उसकी लगाम पकड़कर धीरे-धीरे चलने लगे।
सहसा उन्हें एक झटका-सा लगा और लगाम हाथ से छूट गई। उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब उन्होंने देखा कि अपाहिज घोड़े की पीठ पर तनकर बैठा है और घोड़े को दौड़ाए लिए जा रहा है। उनके मुख से भय, विस्मय और निराशा से मिली हुई चीख निकल गई। वह अपाहिज डाकू खड्गसिंह था।
बाबा भारती कुछ देर तक तो चुप रहे और इसके पश्चात् कुछ निश्चय कर पूरे बल से चिल्लाकर बोले – “जरा ठहर जाओ।” ।
खड्गसिंह ने आवाज सुनकर घोड़ा रोक लिया और उसकी गरदन पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा – “बाबाजी, यह घोड़ा अब न दूंगा।”
“परंतु एक बात सुनते जाओ।”
खड्गसिंह ठहर गया।
बाबा भारती ने निकट जाकर उसकी ओर ऐसी आँखों से देखा जैसे बकरा कसाई की ओर
देखता है। फिर कहा – “यह घोड़ा तुम्हारा हो चुका | मैं तुमसे इसे वापस करने के लिए न कहूँगा। परंतु खड्गसिंह, केवल एक प्रार्थना करता हूँ। उसे अस्वीकार न करना, नहीं तो मेरा दिल टूट
जाएगा।”
“बाबा जी, आज्ञा कीजिए। मैं आपका दास हूँ, केवल यह घोड़ा न दूंगा।”
“अब घोड़े का नाम न लो। मैं तुमसे इसके विषय में कुछ न कहूँगा । मेरी प्रार्थना केवल यह है कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना।”
खड्गसिंह का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया। उसका विचार था कि उसे घोड़े को लेकर यहाँ से भागना पड़ेगा, परंतु बाबा भारती ने उससे
कहा कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना। इससे क्या प्रयोजन सिद्ध हो सकता है? खड्गसिंह ने बहुत सोचा, बहुत सिर मारा,
परंतु कुछ समझ न सका। हारकर उसने अपनी आँखें बाबा भारती के मुख पर गड़ा दीं और पूछा – “बाबा जी, इसमें आपको क्या डर है?”
सुनकर बाबा भारती ने उत्तर दिया – “लोगों को अगर इस घटना का पता लग गया तो वे किसी दीन-दुखी पर विश्वास न करेंगे। यह कहते-कहते उन्होंने सुलतान की ओर से इस तरह मुँह मोड़ लिया जैसे उनका उससे कभी कोई संबंध ही नहीं रहा हो।
बाबा भारती चले गए, परंतु उनके शब्द खड्गसिंह के कानों में उस प्रकार पूँज रहे थे। सोचता था, कैसे ऊँचे विचार हैं, कैसा पवित्र भाव है। उन्हें इस घोड़े से प्रेम था, इसे देखकर उनका मुख फूल की नाईं खिल जाता था। कहते थे . “इसके बिना मैं न रह सकुंगा।” इसकी रखवाली में वह कई रात सोए नहीं। भजन-भक्ति न कर रखवाली करते रहे। परंतु आज उनके मुख पर दुख की रेखा तक दिखाई न पड़ती थी। उन्हें केवल यह खयाल था कि कहीं लोग दीन-दुखियों पर विश्वास करना न छोड़ दें। ऐसा मनुष्य, मनुष्य नहीं, देवता है।
रात्रि के अंधकार में खड्गसिंह बाबा भारती के मंदिर में पहुँचा। चारों ओर सन्नाटा था। आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे। थोड़ी दूर पर गाँवों के कुत्ते भौंक रहे थे। मंदिर के अंदर कोई शब्द सुनाई न देता था। खड्गसिंह सुलतान की बाग पकड़े हुए था। वह धीरे-धीरे अस्तबल के फाटक पर पहुँचा। फाटक खुला पड़ा था। किसी समय वहाँ बाबा भारती स्वयं लाठी लेकर पहरा देते थे, परंतु आज उन्हें किसी चोरी, किसी डाके का भय न था। खड्गसिंह ने आगे बढ़कर सुलतान को उसके स्थान पर बाँध दिया और बाहर निकलकर सावधानी से फाटक बंद कर दिया। इस समय उसकी आँखों में नेकी के आँसू थे।
रात्रि का तीसरा पहर बीत चुका था। चौथा पहर आरंभ होते ही बाबा भारती ने अपनी कुटिया से बाहर निकल ठंडे जल से स्नान किया। उसके
पश्चात इस प्रकार जैसे कोई स्वप्न में चल रहा हो, उनके पाँव अस्तबल की ओर बढ़े। परंतु फाटक पर पहुँचकर उनको अपनी भूल प्रतीत हुई। साथ ही घोर निराशा ने पॉवों को मन-मन भर भारी बना दिया। वह वहीं रुक गए।
घोड़े ने अपने स्वामी के पाँवों की चाप को पहचान लिया और जोर से हिनहिनाया।
अब बाबा भारती आश्चर्य और प्रसन्नता से दौड़ते हुए अंदर घुसे और अपने प्यारे घोड़े के गले से लिपटकर इस प्रकार रोने लगे मानो कोई पिता
बहुत दिन के बिछड़े हुए पुत्र से मिल रहा हो। बार-बार उसकी पीठ पर हाथ फेरते, बार-बार उसके मुंह पर थपकियाँ देते।
फिर वह संतोष से बोले – “अब कोई गरीबों की सहायता से मुँह नहीं मोड़ेगा।”
थोड़ी देर बाद जब अस्तबल से बाहर निकले तो उनकी आँखों से । आँसू बह रहे थे। ये आँसू उसी भूमि पर ठीक उसी जगह पर गिर रहे थे।
जहाँ बाहर निकलने के बाद खड्गसिह खड़ा होकर रोया था।
दोनों के आँसुओं का उसी भूमि को मिट्टी पर परस्पर मिलाप हो गया।
यह भलाई की बुराई पर जीत की कहानी है। सच मे अब हार जीत का कोई अर्थ नहीं था । कोई जीतकर भी हारा था और कोई हारकर भी जीता था , मगर दु:खी कोई भी नहीं था । सच्चे अर्थों मे ये तो मानवता की जीत थी । कहते हैं कि बुरे आदमी के हृदय में भी अच्छाई छिपी रहती है जो प्रेरणा पाकर उसका हृदय-परिवर्तन कर देती है। बाबा भारती द्वारा कहे गए शब्द से बर्बर डाकू खड्गसिंह आंदोलित हो उठता है और उसका मन परिवर्तित हो जाता है। बाबा भारती हार कर भी जीत जाते हैं और डाकू खडंगसिंह जीत कर भी हार जाता है।
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