मूर्ख वृक्ष की मूर्खता पुरे जंगल के सफाए का कारण बना
।।🚩ॐ श्री गुरुदेवाय नमः🚩।।
एक जंगल में दो वृक्ष मिल जुलकर रहते थे। उसी जंगल में एक शेर और बाघ भी मित्रवत रहते थे। दोनों शिकार करते और अपनी भूख मिटाकर बचे हुए मांस और हड्डियां वहीं छोड़ देते थे, जिससे सारे वातावरण में दुर्गंध फैल जाती थी।
एक दिन पहला वृक्ष बोला, "दोस्त ! ये जानवर मुसीबत बन गए हैं। इनकी जूठन की दुर्गंध से मेरा सांस लेना दूभर हो गया है।" दूसरे वृक्ष ने कहा, "हां, अब तो यहां रहना भी मुश्किल होता जा रहा है।"पहले वृक्ष ने गुस्से में कहा, "अब और बर्दाश्त नहीं कर सकता। इन जानवरों को यहां से भगाकर ही रहूंगा।" दूसरे वृक्ष ने समझाया, "नहीं मित्र! ऐसी बेवकूफी कभी न करना। ये जंगली पशु ही हमारी रक्षा करते हैं।" पहले वृक्ष ने दृढ़ स्वर में कहा, "किंतु यह तो सोचो, इनके यहां न रहने पर हवा कितनी शुद्ध व सुहावनी होगी। मैंने तो तय कर लिया है कि इन्हें यहां से भगाकर ही रहूंगा।' दूसरे वृक्ष ने फिर समझाया, "मित्र! तुम नहीं जानते कि क्या करने जा रहे हो?' इस प्रकार, दोनो काफी देर तक तर्क-वितर्क करते रहे।
एक रात की बात है। "अहा! कितनी तेज हवा चल रही है। यही मौका है जब जानवरों को यहां से भगाया जा सकता है। यह सोचकर पहला वृक्ष जोर-जोर से हिलकर भयंकर आवाज करने लगा। पेड़ के नीचे सोए सारे जानवर हड़बड़ाकर जाग गए। "यह कैसी आवाज है?" शेर ने चीते से पूछा।"उस पेड़ को तो देखो,कितनी जोर से हिल रहा है?" चीते ने कहा। शेर ने आशंका जताई, "लगता है इस पर कोई भूत आ गया है। चलो, यहां से भाग चलें।" चीता बोला, "हां, यहां से भागने में ही भलाई है। जल्दी करो।" शेर और चीते को भागता देख अन्य जानवर भी भाग खड़े हुए। अगले दिन सुबह पहले पेड़ ने कहा, "आखिरकार मैंने जानवरों से पीछा छुड़ा ही लिया। अब हवा में ताजगी आ गई है।"
जानवरों के न होने से जंगल में निरवता छा गई थी। एक दिन एक ग्रामीण अपने बछड़े को ढूंढता हुआ वहां आया। लौटते समय उसने सोचा, “यहां शेर-बाघ नहीं हैं। दूसरे जानवरों के पैरों के निशान भी नजर नहीं आ रहे।'' गांव पहुंच कर उसने सभी को सुनसान जंगल के बारे में बताया। दूसरे दिन गांव वाले उन्हीं पेड़ों के निकट आ धमके। एक ग्रामीण बोला, "लगता है बरसों से यहां कोई जानवर नहीं रह रहा है।" दूसरे ग्रामीण ने उसकी बात का समर्थन किया। "तब तो यह जमीन हमारे मतलब की है।" तीसरे ग्रामीण ने कहा। ग्रामीणों की बात सुनकर दोनों पेड़ स्तब्ध रह गए। दूसरे वृक्ष ने कहा, "देखा! ये मनुष्य क्या योजना बना रहे हैं? मैंने तुमसे कहा था कि जंगल के जानवरों को मत भगाओ।"
"चिंता मत करो। जैसे मैंने जानवरोंको भगाया, वैसे ही इन्हें भी भगा दूंगा।"यह कहकर पहले वृक्ष ने फिर स्वयं को जोर-जोर से हिलाकर डरावनी आवाज निकाली। "यह कैसी डरावनी आवाज है बाबा?'' एक ग्रामीण ने बुजुर्ग से पूछा। बुजुर्ग ने समझाते हुए कहा, "डरने की जरूरत नहीं। तेज हवा पत्तियों को छूकर बहती है तो ऐसी आवाज निकलती है।" वृक्ष ने फिर वैसी ही हरकत की, जिससे एक-दो टहनियां भी टूटकर नीचे गिरी। यह देखकर ग्रामीण घबरा गए। तब बुजुर्ग ने ढांढस बंधाते हुए कहा, "घबराते क्यों हो? एक-दो टहनियां ही तो गिरी हैं। हम इन पेड़ों को काटकर इनकी लकड़ियां जलाने के काम में लेंगे।''
कुछ दिन बाद गांववालों ने जंगल के पेड़ काट डाले। अब केवल वही दो वृक्ष रह गए थे। तभी एक ग्रामीण ने मूर्ख वृक्ष की ओर इशारा करते हुए कहा कि कल उसे काटेंगे। यह सुनकर पहले वृक्ष ने कहा,"मुझे बचाओ मित्र! वे कल मुझे काटेंगे। मेरी मदद करो।" दूसरा वृक्ष बोला, “अब क्या हो सकता है? तुम्हें अपने किए का परिणाम तो भोगना ही होगा।" इस तरह मूर्ख वृक्ष का अंत हो गया और उसका साथी भी बच न पाया।
इस कहानी से यह सीख मिलती है कि प्रकृति ने धरती पर जन-जीवन की जो व्यवस्था की है। उससे छेड़छाड करना घातक है। प्राकृतिक संतुलन हर हाल में कायम रहना चाहिए। मूर्ख वृक्ष ने अपने साथी की बात नहीं मानी और पुरे जंगल के सफाए का कारण बना।
।।🇮🇳भारत माता की जय🇮🇳।।

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