संघ की आत्मीय प्रार्थना.प्रार्थना का हिंदी अर्थ व ऐतिहासिक विकास क्रम
।।⛳ॐ श्री गुरुदेवाय नमः⛳।।
संघ की आत्मीय प्रार्थना है नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे..
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम में “प्रार्थना” का बहुत ही महत्व है.राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की हर गतिविधि दैनिक शाखा के जरिये संपन्न होती है.संघ की शाखा या अन्य कार्यक्रमों में इस प्रार्थना को अनिवार्यतः परमपवित्र “भगवा-ध्वज” को नमन करके गाया जाता है.शाखा का समापन “ध्वज प्रणाम” के साथ इसी प्रार्थना के माध्यम से होता है.
प्रस्तुत है संघ की आत्मीय प्रार्थना…
●”प्रार्थना”●
नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमेत्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोहम् |
महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे
पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते ||१||
प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता
इमे सादरं त्वां नमामो वयम् |
त्वदीयाय कार्याय बध्दा कटीयं
शुभामाशिषं देहि तत्पूर्तये ||
अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिं
सुशीलं जगद्येन नम्रं भवेत् |
श्रुतं चैव यत्कण्टकाकीर्ण मार्गं
स्वयं स्वीकृतं नः सुगं कारयेत् ||२||
समुत्कर्षनिःश्रेयस्यैकमुग्रं
परं साधनं नाम वीरव्रतम् |
तदन्तः स्फुरत्वक्षया ध्येयनिष्ठा
हृदन्तः प्रजागर्तु तीव्रानिशम् ||
विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर्
विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम् |
परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं
समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम् ||३||
|| भारत माता की जय ||
प्रार्थना का हिंदी अनुवाद ः~
हे वत्सल मातृभूमि ! मैं तुझे निरन्तर प्रणाम करता हूँ।
हे हिन्दुभूमि ! तूने ही मेरा सुखपूर्वक संवर्धन किया है।
हे महामंगलमयी पुण्यभूमि ! तेरे लिए ही मेरी यह काया काम आये।मै तुझे बारम्बार प्रणाम करता हूँ।।१।।
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर ! हम हिन्दुराष्ट्र के अङ्गभूत घठक,तुझे आदरपूर्वक प्रणाम करते हैं। तेरे ही कार्य के लिए हमने अपनी कमर कसी है। उसकी पूर्ति के लिए हमें शुभ आशीर्वाद दें। विश्व के लिए जो अजेय हो ऐसी शक्ति,सारा जगत जिससे विनम्र हो ऐसा विशुद्ध शील तथा बुद्धिपूर्वक स्वयं स्वीकृतं हमारे कण्ठकमय मार्ग को सुगम करने वाला ज्ञान व विवेक भी हमें दे।।२।।
ऐहिक और पारलौकिक कल्याण तथा मोक्ष की प्राप्ति के लिए वीरव्रत नामक एकमेव,श्रेष्ठ,उत्कट साधन है,उसका हमारे अंतःकरण में स्फुरण हो।
हमारे ह्रदय में अक्षय तथा तीव्र ध्येयनिष्ठा सदैव जागृत रहे। तेरे आशीर्वाद से हमारी विजयशालिनी संघठित कार्यशक्ति स्वधर्म का रक्षण कर अपने इस राष्ट्र को परम वैभव की स्थिति में ले जाने में पूर्णतया समर्थ हो।।३।।
।।भारत माता की जय।।
प्रार्थना “पद्य” में ः~
हे परम वत्सला मातृभूमि! तुझको प्रणाम शत कोटि बार।हे महा मंगला पुण्यभूमि ! तुझ पर न्योछावर तन हजार।।हे हिन्दुभूमि भारत! तूने, सब सुख दे मुझको बड़ा किया;तेरा ऋण इतना है कि चुका, सकता न जन्म ले एक बार।
हे सर्व शक्तिमय परमेश्वर! हम हिंदुराष्ट्र के सभी घटक,
तुझको सादर श्रद्धा समेत, कर रहे कोटिशः नमस्कार।।
तेरा ही है यह कार्य हम सभी, जिस निमित्त कटिबद्ध हुए;वह पूर्ण हो सके ऐसा दे, हम सबको शुभ आशीर्वाद।
सम्पूर्ण विश्व के लिये जिसे, जीतना न सम्भव हो पाये;
ऐसी अजेय दे शक्ति कि जिससे, हम समर्थ हों सब प्रकार।।दे ऐसा उत्तम शील कि जिसके, सम्मुख हो यह जग विनम्र;दे ज्ञान जो कि कर सके सुगम, स्वीकृत कन्टक पथ दुर्निवार।
कल्याण और अभ्युदय का, एक ही उग्र साधन है जो;
वह मेरे इस अन्तर में हो, स्फुरित वीरव्रत एक बार।।
जो कभी न होवे क्षीण निरन्तर, और तीव्रतर हो ऐसी;
सम्पूर्ण ह्र्दय में जगे ध्येय, निष्ठा स्वराष्ट्र से बढे प्यार।
निज राष्ट्र-धर्म रक्षार्थ निरन्तर, बढ़े संगठित कार्य-शक्ति;
यह राष्ट्र परम वैभव पाये, ऐसा उपजे मन में विचार।।
प्रार्थना अन्वय और शब्दार्थ ः~
वत्सले मातृभूमि ! = (हे) अपनी संतानों पर प्रेम करने वाली मातृभूमि , ते = तुझे , सदा = निरन्तर , नमः = प्रणाम , हिन्दुभूमे = हे हिन्दुभूमि , त्वया = तेरे द्वारा, अहम् = मैं , सुखम् वर्धितः = सुख में बढ़ाया गया हूँ, (वर्धितोअहम् =वर्धितः+अहम्) , महामङ्गले पुण्यभूमे =हे परम मंगलमयी पूण्य भूमि ! , त्वदर्थे = (त्वत्+अर्थे) तेरे लिए , एषः= यह , कायः = शरीर , पततु=अर्पित हो ,(पततु+एषः), नमस्ते नमस्ते = बारम्बार नमस्कार ।।1।।
प्रभो शक्तिमन्= हे शक्तिमान प्रभो ! , हिंदुराष्ट्रांगभूता =हिन्दु राष्ट्र के अंगभूत घटक , इमे=ये , वयं = हम , त्वाम् = तुझे , सादरम् =आदर सहित , नमामः=प्रणाम करते हैं , त्वदीयाय=तेरे लिए , कार्याय=कार्य हेतु , इयम्=यह , कटि=कमर , (कटियम् =कटि+इयम् ) , बद्धा=बाँधी है ,कसी है , तत्पूर्तये=उसकी पूर्ति के लिए , शुभाम् आशिषम् =शुभ आशीर्वाद , देहि=दे , ईश=हे ईश ! , विश्वस्य=विश्व के लिए , अज्य्याम्=जिसे जितना सम्भव नहीं ,
शक्तिम्=शक्ति , देहि=दे , येन=जिससे , जगद्=विश्व , नम्रम्=नम्र । भवेत् =हो (ऐसा) , सुशीलम्=उत्तम शील , यत्=जो , स्वयम् स्वीकृतम्=अपनी प्रेरणा से स्वीकृत किया हुआ , नः=हमारे , कण्टकाकीर्णमार्गम् = कण्टकमय मार्ग को (कण्टक=काटे,कष्ट+आकीर्ण=व्याप्त) , सुगम् करयेत्=सुगम करें (ऐसा) , श्रुतम् =ज्ञान , चैव=तथा,भी , देहि=दे।।2।।
समुत्कर्षनिःश्रेयसस्य =समुत्कर्ष और निःश्रेयस का (समुत्कर्ष=ऐहिक और पारलौकिक कल्याण, निःश्रेयस+मोक्ष) , एकम् परम् उग्रम् साधनम् =एकमात्र परम उग्र साधन(जो) , वीरव्रतम् नाम=वीरव्रत नामक(है) , तत्=वह,उसको , अन्तः=अन्तः करण में , स्फुरतु=स्फुटित हो ,जागृत हो , अक्षया=क्षीण न होने वाली , तीव्रा=तीव्र , ध्येयनिष्ठा=ध्येय के प्रति निष्ठा ,
अनिशम्=नित्य , हृदन्तः=ह्रदय में , प्रजागर्तु=जागृत रहे ,विजेत्री=विजयशालिनी , च=और,व , नः=हमारी , संहता=संगठित कार्यशक्ति ,
अस्य=इस , धर्मस्य=धर्म का , संरक्षणम्=संरक्षण , विधाय+अस्य=करते हुए इसको ,
एतत्=इसको,इस , स्वराष्टम्=अपने राष्ट्र को परम् वैभवम्=परम वैभव की स्थिति में , नेतुम्=ले जाने में , ते=तेरे , आशीषम्=आशीर्वाद से , भृशम्=अतीव , समर्था=समर्थ ,भवतु=हों ।।3।।
प्रार्थना से संबंधित जानकारी
यह प्रार्थना सन् 1940 से व्यवहार में आयी.प्रार्थना के आशय का प्रारूप सन् 1939 में नागपुर के पास सिन्दी में हुई बैठक में तैयार किया गया.
अपनी प्रार्थना के तीन श्लोक हैं। वह संस्कृत भाषा में हैं। ‘भारत माता की जय’ यह प्रार्थना का ही भाग है।
प्रार्थना के प्रथम श्लोक का वृत्त ‘भुजंगप्रयात’ है। उसकी प्रत्येक पंक्ति में बारह अक्षर हैं।
दूसरे और तीसरे श्लोक का वृत्त है ‘मेघनिर्घोष’। उसकी प्रत्येक पंक्ति में तेईस अक्षर हैं। तेईस अक्षरों की पंक्ति बड़ी होने से हम लोग प्रत्येक पंक्ति के दो भाग करते हैं। प्रथम बारह अक्षर बोलते हैं और बाद
में ग्यारह.
प्रार्थना का विकास क्रम ः~
संघ जैसे विकासशील और गतिमान संघठन के लिए उसकी संरचनाओं का लचीलापन और देश-काल और परिस्थिति के अनुसार उनमें योग्य परिवर्तन करने की संघ की सिद्धता उसकी शक्ति सिद्ध हुई है.प्रारम्भ में (1926) में शाखा के शारीरिक व बौद्धिक कार्यक्रमों के बाद जो प्रार्थना बोली जाती थी,उसमे एक पद मराठी व एक पद हिंदी का था.
इसी वन्दना में कुछ आवश्यक परिवर्तन करके प्रार्थना का तत्कालीन प्रार्थना से आवश्यक पदों को संघ की प्रार्थना के लिए चुना गया.तत्कालीन प्रार्थना के अन्त में छत्रपति शिवाजी महाराज के प्रेरणा स्रोत्र उनके गुरु श्री “समर्थ रामदास स्वामी” जी का जयघोष बोला जाता था.वह प्रार्थना इस प्रकार थी :-
मराठी :-
“नमो मातृभूमि जिथे जन्मलो मी ।
नमो आर्यभूमि जिथे वाढलो मी ।।
नमो धर्मभूमि जियेच्याच कामी ।
पड़ो देह माझा सदा ती नमीमी ।।”
हिन्दी :-
“हे गुरु श्री रामदूता,शील हमको दीजिये,
शीघ्र सारे दुर्गुणों से,मुक्त हमको कीजिये।।
लीजिये हमको शरण में,राम पन्थी हम बनें,
ब्रह्मचारी धर्म रक्षक,वीरव्रत धारी बनें ।।
“राष्ट्र गुरु श्री समर्थ रामदास स्वामी की जय !”
प्रार्थना की भाषा में परिवर्तन
उस समय संघ कार्य विदर्भ प्रान्त तक ही सीमित था. जैसे-जैसे संघ कार्य का विस्तार संपूर्ण भारतवर्ष में फैलने लगा. प्रार्थना की भाषा में परिवर्तन का अनुभव होने लगा.फरवरी 1939 में सिन्दी में एक बैठक हुई उसमें आद्य सरसंघचालक प.पू.डाँ केशव बलिराम हेडगेवार जी, द्वितीय सरसंघचालक प.पू.श्री गुरु जी ,श्री तात्याराव तैलंग,माननीय श्री बाबासाहब आप्टे,श्री विट्ठलराव पतकी,श्री बाबाजी सालोडकर,श्री कृष्णराव मोहरीर,श्री नाना साहब टालाटूले,श्री नरहरि नारायण भीड़े आदि कई स्वयंसेवक उपस्थित थे.
संस्कृत भाषा में प्रार्थना
इसी बैठक में संस्कृत भाषा में प्रार्थना का ऐतिहासिक निर्णय हुआ,क्योंकि संस्कृत भाषा समस्त भारतीय भाषाओं की जननी है. जो राष्ट्र को एक सूत्र में जोड़ने वाली है और समस्त हिन्दु समाज को स्वीकार्य है. अब प्रार्थना का “गद्य” प्रारूप के लिए माननीय श्री “नाना साहब टालाटुले”और “पद्य” प्रारूप का दायित्व माननीय श्री “नरहरि नारायण भिड़े” जी को दिया गया. सम्पूर्ण प्रार्थना संस्कृत में है केवल इसकी अन्तिम पंक्ति (भारत माता की जय!) हिन्दी में है.
प्रार्थना का प्रथम गायन
इस प्रार्थना का प्रथम गायन शास्त्रीय संगीत के मुर्धन्य संगीतज्ञ माननीय श्री “यादवराव जोशी” जी के द्वारा 23 अप्रैल 1940 में पुणे के संघ शिक्षा वर्ग में किया गया. इस प्रार्थना में पूर्व प्रार्थना के सभी महत्वपूर्ण भावों का समावेश तो किया ही गया, साथ ही उसमे कुछ और अभीष्ट भावों को भी समाविष्ट कर उसे और अधिक समृद्ध किया गया.
संघ का मंत्र है प्रार्थना
इस प्रार्थना में संघ का लक्ष्य,लक्ष्य प्राप्ति का मार्ग,लक्ष्य प्राप्ति के लिए आवश्यक गुण,संघ के अधिष्ठान,संकल्प आदि सभी कुछ को समाहित किया गया । प्रार्थना मात्र पुरुषार्थवादी है,इसलिए कार्य हम करेंगे,प्रयास हम करेंगे न की भगवान,किन्तु उन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक गुणों की पूर्ति भगवान से मांगी गयी है ऐसा जानना चाहिए।
स्वयंसेवक बंधुओं से आत्मीय निवेदन
अत: मैं आप से पुनः निवेदन करूँगा कि प्रार्थना में यह स्पष्ट उल्लेख है कि यह ईश्वरीय कार्य है, इसका हम पुनः पुनः उच्चारण करें। प्रत्येक स्वयंसेवक को प्रार्थना कण्ठस्थ कर उसके स्वर, उच्चारण,शब्दार्थ और भावार्थ आदि का सम्यक ज्ञान आवश्यक है। उसका अर्थ देखें,उसे समझें,उसका चिंतन,मनन करें,उससे समरस हो,अपना जीवन इस पुनीत कार्य के लिए समर्पित करें। सर्वकर्मफलत्याग की भावना से करें। फिर यह ईश्वरीय कार्य होने का हमें साक्षात्कार होगा। उसे करते हुए एक दिव्य आनंद की अनुभूति हमें होगी और फिर कमर कस कर यह ईश्वरीय कार्य तन से,मन से,धन से,अत्यधिक परिश्रम से करने के लिए हमें असीम शक्ति प्राप्त होगी;अदम्य शक्ति प्राप्त होगी।
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।।🇮🇳भारत माता की जय🇮🇳।।

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