सती अनसूया के सतीत्व बल का चमत्कार ! त्रिदेव बने दूधमुँहे बच्चे.
।।🚩ॐ श्री गुरुदेवाय नमः🚩।।
ब्रम्हर्षि कर्दम और देवी देवहूति की पुत्री अनसूया भारतवर्ष की अद्वितीय सती साध्वी नारी थी. उनके चरित्र में स्वाभाविक सत्य, धर्म, शील, सदाचार, विनय, लज्जा, क्षमा, सहिष्णता तपस्या आदि सद्गुण विकसित थे. ब्रह्माजी के मानस पुत्र परम तपस्वी महर्षि “अत्रि” को इन्होंने पतिरूप में प्राप्त किया था. पतिव्रता तो वो थी ही. पावन प्रेमभरी सतत सेवा से पति का हृदय जीत लिया था. तपस्या में खूब आगे बढ़ चुकी थीं फिर भी पति की सेवा को ही नारी के लिए परम कल्याण का साधन मानती थीं.
एक बार भगवती लक्ष्मीजी, माता सती और ब्रह्माणीजी को अपने पातिव्रत्य का बड़ा अभिमान आ गया. भगवान और सब सह लेते हैं किन्तु अपने भक्तों का अहंकार हरगिज नहीं सहते. भगवान परम करुणामय हैं पर अहंकार जीव को भगवान से दूरातिदूर ले जाता है. अहंकार ही तो जीव और शिव के बीच दीवार बनकर खड़ा है.
कौतुकप्रिय नारदजी को इन तीनों जगवन्दनीया देवियों के गर्व को दूर करने के निमित्त मन में प्रेरणा मिल गई. प्रथम वे पहुँचे लक्ष्मीजी के पास। उनको देखकर लक्ष्मीजी ने समाचार पूछा तो नारदजी ने कहा :
‘माताजी ! क्या बताऊँ ? मेरा जीवन कृतार्थ हो गया. चित्रकूट की ओर महर्षि अत्रि के आश्रम में उनकी पतिव्रता पत्नी भगवती अनसूया के पावन दर्शन करने का अवसर मिला. संसार में उनके समान पतिव्रता अन्य कोई भी नहीं है. संसार की सभी सती-साध्वी पतिव्रताओं में वे शिरोमणि हैं.”
यह सुनकर लक्ष्मीजी को बुरा लगा. यह मेरे घर का बच्चा मेरे ही सामने अन्य पतिव्रता स्त्री को मुझसे उत्तम बताता है ! यह तो मेरालअपमान है.’ बात स्पष्ट करने के लिए पूछा : “नारद ! क्या अनसूया मुझसे भी बढ़कर है ?”
”माताजी! आप बुरा न मानना.आप उन देवी अनसूया की चौथाई के बराबर भी नहीं.”
लक्ष्मीजी का मुँह फीका पड़ गया. उनके मन में ईर्ष्या पैदा हुई. मनोमन निश्चय कर लिया कि अनसूया को नीचा दिखाकर रहूँगी. नारद ने देखा, निशाना ठीक जगह पर लगा है. उन्होंने तो कलह का बीज बो दिया था. ठीक समय पर जोती-गोड़ी उर्वर भूमि में बीज जल्दी ही उगकर वृक्ष बन जायगा. प्रसन्न होकर अब वे कैलास की ओर चल दिये.
इधर भगवान विष्णु पधारे तो लक्ष्मीजी मुँह फुलाकर बैठ गई. भगवान ने बहुत समझाया, दुलार किया तब लक्ष्मी जी बोली : “देखोजी,सुन लो मेरी बात. बहुत दिनों तक मैंने आपके पैर दबाये, आपकी हाँ में हाँ मिलाई.आज तक कुछ नहीं माँगा.आज आपको एक बात माननी पड़ेगी। वादा करो.’
विष्णु : ‘‘हाँ, वादा करता हूँ। पट्टा लिख दें या गंगाजी में खड़ा होकर कहूँ?” लक्ष्मीजी खुश हो गई और बोली : ‘‘बस महाराज, विश्वास है. आपको कुछ भी करके अनसूया देवी का सतीत्व भंग करना होगा.
भगवान मामला समझ गये. मन में कहने लगे कि ‘अरे देवि ! हममें इतनी सामर्थ्य कहाँ जो उस देवी का पातिव्रत्य खंडित कर सकें ?’ परन्तु प्रकट में हँसकर बोले : ”बस इतनी-सी बात पर मुँह फुला लिया था ? हम अभी जाते हैं.भगवान इतना कहकर अत्रि के आश्रम की ओर चल पड़े.
उधर नारदजी पहुँचे कैलास.सतीजी ने स्वागत करके एक लड्डू दिया। खाते ही नारद बोले : ”वाह ! लड्डू मीठा तो है मगर अनसूया के लड्डू में जैसा अमृतमय स्वाद है वैसा इसमें नहीं.
माता सती ने पूछताछ की तो नारदजी ने देवी अनसूया की प्रशंसा करते हुए बताया कि : ‘भगवती अनसूया भगवान अत्रि की प्राणप्रिया पत्नी है और विश्व में सर्वोत्तम पतिव्रता देवी हैं. आपका पातिव्रत्य भी उनके आगे फीका है.”
यह सुनते ही सतीजी दौड़ी-दौड़ी शिवजी के पास पहुँची. स्त्री चरित्र रचके भोलेनाथ को सती अनसूया का सतीत्व भंग करने के लिए राजी कर लिया. भोले बाबा अत्रि-आश्रम की ओर चल दिये.
इधर नारदजी ब्रह्मलोक में माता ब्रह्माणी के पास पहुँचे. माता ने बेटे को बहुत समय के बाद आया हुआ देखा तो उनका दिल खिल उठा. फिर बातचीत के सिलसिले में नारदजी ने बताया : ‘माताजी ! मर्त्यलोक में एक बड़ी अद्भुत बात देखी. क्या बताऊँ ? अत्रिपत्नी अनसूया के पातिव्रत्य का ऐसा प्रभाव है कि सब ऋषि-मुनि आकर उनका स्तुति करते हैं.उनसे बढ़कर संसार में कोई पतिव्रता नहीं है।”
ब्रह्माणी : ”क्या मुझसे भी बढ़कर पतिव्रता है ?
नारद : ”अपनी माँ तो माँ ही है, सर्वश्रेष्ठ है ही. किन्तु
ऋषि-मुनि लोग यही बात कर रहे हैं कि आज अनसूया से बढ़कर कोई अन्य पतिव्रता नहीं है.”
बात बन गई। ब्रह्माणी ने तुरन्त सभा में से ब्रह्माजी को बुलवाया और येन केन प्रकारेण देवी अनसूया को पातिव्रत्य- धर्म से च्युत करने के लिए ब्रम्हााजी को बाध्य किया. ब्रह्माजी तो समझते ही थे कि जो दूसरों के लिये के लिए खाई खोदता है उसके लिए कुआँ खुदा-खुदाया तैयार रहता है. वे अत्रि-आश्रम की ओर चल पड़े.
भगवती मंदाकिनी के तट पर तीनों देव महामुनि अत्रि के आश्रम में पहुँचे. परस्पर अभिवादन किया.सभी ने अपने आने का कारण बताया. आपस में सलाह की और तीनों साधु का वेश बनाकर सती अनसूया के पातिव्रत्य की परीक्षा करने चले.
अतिथिरूप में तीन मुनियों को आते देखकर देवी अनसूया ने उनका स्वागत-सत्कार किया. अर्ध्य, पाद्य, आचमनीय देकर कन्द, मूल,फलादि भेंट किये.किन्तु मुनियों ने इस आतिथ्य को स्वीकार नहीं किया.देवी के पूछने पर मुनियों ने कहा : “आप हमें एक वचन दें तो आपकी पूजा ग्रहण करेंगे.”
अनसूया : ‘मुनियों ! अतिथि का सत्कार प्राणों का बलिदान करके भी किया जाता है.आप जिस प्रकार प्रसन्न होंगे, उसी प्रकार मैं करने को तैयार हूँ.”
तब मुनियों ने अनसूया को वचनबद्ध देखकर कहा : ”देवी! आप अपने मर्मस्थान नग्न करके हमारा आतिथ्य सत्कार कीजिये.”
यह सुनकर पतिव्रता अनसूया हक्की-बक्की-सी रह गई. यह अनुचित प्रस्ताव करनेवाले तीन मुनि कौन हैं यह देखने के लिए ध्यान लगाया तो सब रहस्य ज्ञात हो गया. फिर बोली : “हे अतिथि देवों ! मैं ऐसे ही होकर आपका सत्कार करूंगी.”
फिर सती ने पानी में निहारते हुए संकल्प किया कि: ‘यदि मैं सच्ची पतिव्रता हूँ, मैंने कभी भूल से भी, स्वप्न में भी काम-भाव से परपुरुष कावचिन्तन न किया हो तो आप तीनों छ:-छ: महीने के बच्चे बन जायँ.’
ऐसा संकल्प करके वह पानी तीनों मुनियों पर छिड़क दिया. तीनों के तीनों छ:-छ: महीने के दूधपीते बच्चे बनकर पालने में ऊँवाँ ऊँवाँ करने लगे. इतने में ही महामुनि अत्रि भी आ गये. पूछा : “देवी ! ये देवस्वरूप, परम सुन्दर, मनोहर तीनों बच्चे किस भाग्यशाली के हैं ?
अनसूया : ”भगवन् ये आपके ही हैं.” मुनि सब रहस्य समझ गये. तीनों देवता बच्चे बनकर वहाँ रहने लगे। माता अन,खिलातीं, पिलातीं, पुचकारती, पालने में झुलातीं.
उधर तीनों देवियाँ अपने देवेश्वरों को लापता पाकर चिन्तित हो उठी.अपने भर्ताओं को ढूंढने के लिए घर से निकल पड़ी.अकस्मात चित्रकूट में इकट्ठी हो गईं.परस्पर वाणीविनिमय करने से पता चला कि यह सब नारदजी की कारस्तानी थी.इतने में नारदजी भी ‘नारायण नारायण…’ करते उनके पास पहुँचे और तीनों देवों का हाल बताते हुए कहा.
‘माताएँ ! देखो, वहाँ भगवती अनसूया का आश्रम है. वहाँ तीनों देव छ:-छः महीने के बच्चे बनकर उनकी गोद में बैठकर स्तनपान कर रहे हैं.अब उनकी आशा छोड़ो. आप उस आश्रम में पैर रखेंगी तो सती अनसूया आपको पल भर में भस्म कर देंगी.उन तीनों देवों की चिन्ता अब छोड़ो.पन्द्रह-बीस वर्ष में वे बड़े होंगे तब माता उनका फिर से कहीं विवाह कर देगी.अब आप सब भस्म रमाकर, माला लेकर भजन करो दूसरा कोई उपाय नहीं है.अनसूया के समान संसार में दूसरी कोई सती नहीं है. अब समझीं कि नहीं ?
तीनों ने पश्चात्ताप भरे स्वर में कहा : ”अब भैया ! तू जीता, हम सब हारीं. हमने अपने किये का फल पा लिया. हमने अच्छा सबक सीखा कि कभी किसी गुणवान के प्रति असूया-ईर्ष्या नहीं करनी चाहिये.दूसरों से ईर्ष्या करना बड़ा पाप है.”
नारदजी ने कहा : ”अब आई ठिकाने पर.पश्चात्ताप से सब पाप धुल जाते हैं. एक उपाय है.आप जाकर सती शिरोमणि अनसूया माता” के पैर पकड़ो. तभी कल्याण होगा.”
तीनों अनसूया के पास गईं, पैर पकड़े और अपने पति जैसे पहले थे वैसे बनाकर लौटाने के लिए प्रार्थना की.
अनसूया : ”आप सब कौन हैं ?’
तीनों : ”हम आपकी पुत्रवधू हैं.”
अनसूया : ‘अजी ! मेरे बच्चे तो अभी छोटे-छोटे हैं और इतनी बड़ी लंबतड़ंग बहुएँ कहाँ से आ गई है.
इतने में महर्षि अत्रि आये.तीनों बहुएँ पूँघट मारकर एक ओर हट गईं.
मुनि ने पूछा : ”देवी ! ये तीनों कौन हैं ?
अनसूया : ”भगवन् ! ये आपकी पुत्रवधुएँ हैं.”
मुनि : ”देवी ! तुम कमाल के खेल रचती हो.अभी तो पुत्र बना लिए और वे छः महीने के नहीं हुए कि पुत्रवधुएँ भी आ गईं ! हाथ भर के बच्चे और पाँच हाथ की बहुएँ !’
अनसूया : ”मेरे बच्चे भी एक दिन बड़े हो जायेंगे.” सुनकर मुनि हँसने लगे. अब तीनों ने सती के पैर पकड़े और अपने-अपने पतियों को वापस पाने के लिए प्रार्थना करने लगी.
अनसूया : ”मैं कब मना करती हूँ? आपके पति ये सो रहे हैं पालने में. गोदी में उठाकर ले जाओ.’
तीनों देवियाँ लज्जित हो गईं. वे पश्चात्ताप से भर गईं. आखिर माता का हृदय पसीज गया. हाथ में जल लेकर संकल्प किया और बच्चों के ऊपर छिड़क दिया. तीनों देव अपने-अपने असली स्वरूप में आ गये.अनसूया ने तीनों देवों की विधि सहित पूजा और प्रदक्षिणा की.
प्रसन्न होकर देवों ने वरदान माँगने के लिए कहा.
अनसूया : ”आप यदि मुझ पर प्रसन्न हैं तो मैं यही माँगती हूँ कि आप तीनों मेरे पुत्र हो जायें.’
“तथास्तु!” फिर तीनों ने नतमस्तक खड़ी लक्ष्मीजी, सतीजी तथा ब्रह्माणीजी से पूछा : ”अब कहो, संसार में सबसे बड़ी सती कौन है ? तीनों ने एक साथ कहा : ”परम पूज्या प्रातःस्मरणीया भगवती अनसूया देवी सर्वश्रेष्ठ सती हैं.”तत्पश्चात तीनों भगवान अपनी-अपनी पत्नियों के साथ अपने-अपने लोक को प्रस्थान कर गए.
कालांतर में त्रिमूर्तियों के अंश से महर्षि अत्रि के तीन पुत्र हुए – “सोम”(चन्द्रमा) के रूप में ब्रह्मा का, भगवान “दत्तात्रेय” रूप में भगवान विष्णु का और “दुर्वासा “के रूप में भगवान शिव का जन्म अनुसूइया के गर्भ से हुआ । कहीं कहीं भगवान दत्तात्रेय को त्रिमूर्तियों का समुच्चय रूप भी कहा गया है. ।
।।⛳भारत माता की जय⛳।।

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